रवि गुप्ता,,, चीफ एडिटर
नेशनल डेस्क। उत्तर प्रदेश में बिजली निगमों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी हो रही है। इसके लिए प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल अपनाया जाएगा। दक्षिणांचल और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम से इसकी शुरुआत होगी।
उत्तर प्रदेश में बिजली निगमों का निजीकरण करने के पीछे सरकार का मकसद है कि बिजली वितरण में सुधार किया जा सके और घाटे को कम किया जा सके। इसके लिए प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल अपनाया जाएगा, जिसमें निजी क्षेत्र की कंपनियों को बिजली वितरण की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
इस निर्णय के बाद प्रबंध निदेशक का पद निजी क्षेत्र की कंपनी का होगा, जबकि कार्पोरेशन का अध्यक्ष सरकार का प्रतिनिधि रहेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों के हितों को प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।
इस निर्णय के विरोध में ऊर्जा संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि घाटे की जांच की जरूरत है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव जितेंद्र सिंह गुर्जर ने भी निजीकरण पर आपत्ति जताई है।
उत्तर प्रदेश में बिजली निगमों का निजीकरण करने के निर्णय का उपभोक्ताओं और कर्मचारियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या यह निर्णय बिजली वितरण में सुधार करेगा और घाटे को कम करेगा? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।